Krishna Birth Story in Hindi श्री कृष्ण जन्म कथा

भगवान श्री कृष्ण विष्णु के अवतार हैं । माना जाता है की जब धरती दुष्टों के बढ़ते अत्याचारों से परेशान हों गयी तो भगवान विष्णु के पास पहुंची, भगवान् विष्णु ने धरती को आश्वासन दिया की वे पृथ्वी पर स्वयं अवतरित होंगे और उनके कष्टों  का निवारण करेंगे ।

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द्वापर युग की बात है जब भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा पर राज्य किया करते थे । उनके पुत्र कंस ने उन्हें राजगद्दी से उतार दिया और खुद मथुरा का राजा बन बैठा । वह बहुत ही अत्याचारी राजा था । कंस की बहन देवकी का विवाह यदुवंशी राजा वासुदेव से हुआ था । एकदिन कंस अपनी बहन को ससुराल छोड़ने ही जा रहा था , तभी भविष्यवाणी हुई की देवकी और वासुदेव की आठवी संतान ही कंस का वध करेगी । यह सुन कंस बौखला गया । उसे अपनी बहन देवकी से काफी लगाव था इसलिए वह उसे मार नहीं पाया । परंतु उसने अपने पिता समेत, देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया । इसी बीच नारद मुनि ने कंस से भेंट की और उसे और विचलित कर दिया की क्या पता कौन सी संतान उसके विनाश का कारण बने । यह सुनते ही कंस ने यह तय कर लिया की वह देवकी और वासुदेव की सभी संतानों को मार डालेगा ।

देखते ही देखते देवकी ने छह बच्चों को जन्म दिया । क्योंकि कंस डरा हुआ था, उसने उनके छह बच्चों का बहुत ही निर्ममता से वध कर दिया । देवकी और वासुदेव  के कष्टों का जैसे कोई अंत ही नहीं था  ।  गोकुल मंडल के मुखिया नंद और उनकी पत्नी यशोदा भी उनके कष्ट से बहुत दुखी थे। देवकी और वासुदेव के सातवें पुत्र को वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में  स्थानांतरित किया गया । यह भी भगवान् विष्णु की माया थी । रोहिणी, नन्द और यशोदा के साथ ही वृंदावन में रहतीं थी । उस बच्चे को बाद में बलराम के नाम से जाना गया । बलराम को शेषनाग का अवतार माना जाता है ।  उधर वृंदावन में यशोदा भी गर्भ से थी ।

कृष्ण जन्म गाथा

जिस कारागार की कोठरी में देवकी और वासुदेव कैद थे, अचानक एकदिन वह प्रकाशमान हो उठा और शंख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु प्रकट हुए । उन्हें देख दोनों के सारे कष्ट दूर हो गए थे ।

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भगवान विष्णु ने कहा, वासुदेव मैं तुम्हारे संतान के रूप में जनम लूंगा और तुम मुझे अपने मित्र नन्द और यशोदा के पास वृंदावन छोड़ आना, साथ ही यशोदा की घर जन्मी बेटी को यहाँ ले आना और कंस को दे देना । दोनों ने उनके चरण छू आशीर्वाद लिए ।

वासुदेव ने वैसा ही किया जैसा उन्हें भगवान विष्णु ने करने को कहा था । जैसे ही देवकी ने नन्हे कृष्ण को जन्म दिया, वासुदेव उन्हें एक टोकरी में रख वृंदावन के लिए निकल पढ़े । वह दिन आलौकिक था, सारे कारागार के पहरेदार सो रहे थे । यमुना नदी में भयंकर तूफान था । ज्यूँ ही वासुदेव यमुना को पार करने लगे, नदी ने उन्हें रास्ता दे दिया । उस तूफान और बारिश के बीच नन्हे कृष्ण की रक्षा के लिए शेषनाग भी पहुँच गए ।  वह दृश्य अत्यंत अद्भुत था । भगवान् स्वयं पृथ्वी पर आये थे, दुष्टों के दमन के लिए ।

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श्री कृष्ण के जन्मदिवस को उनके भक्त बड़े प्रेम से आज तक जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं।

वासुदेव ने नन्द और यशोदा के पास नन्हे कृष्ण को छोड़ा और उनकी नवजात बेटी को ले वृन्दावन से मथुरा की ओर चल पढ़े । उनके मन में भी तूफान उठा हुआ था । जैसे ही वह वापस कारागार में पहुंचे द्वार फिर खुल गए और बन्ध भी हो गए । कंस को ज्यूँ ही पता चला की आठवें संतान का जन्म हो चूका है, वह कारागार की तरफ भगा । कोठारी में पहुँचते ही उसने बच्ची को उठा कर दूर फेंकना चाहा , परंतु तभी उस बच्ची ने दुर्गा का रूप लिया और कंस को कहा – अरे मुर्ख, जो तेरा वध करेगा, वह वृंदावन में पहुँच चूका है । तेरा अंत अब समीप है । यह सुन कंस को बहुत गुस्सा आया और उसने वृंदावन के सभी नवजात बच्चों को मारने के लिए कई दैत्य भेजे । वृन्दावन भी उसके अत्याचारों से अछूता न रहा । कृष्ण के वध के लिए कंस ने पूतना राक्षशी को भेजा ।

श्री कृष्ण बाल कथा – पूतना वध

कंस ने कृष्ण के वध के लिए पूतना राक्षशी को भेजा । पूतना ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर लिया । वह कृष्ण को गोद में ले कर घर से थोड़ी दूर निकल आयी । जैसे ही उसने नन्हे कृष्ण को स्तनपान कराया वह दर्द से करहाने लगी और बचाओ बचाओ चीखने लगी ।

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जब तक गाँव वाले वहां पहुंचे, पूतना का वध हो चूका था । नन्हे कृष्ण की उस लीला को कोई भी नहीं समझ पाया था । उन्हें सब एक नन्हे बालक के स्वरुप में ही देखते थे । लोगों को यह कभी लगा ही नहीं की वह नन्हा सा बालक एक राक्षशी का संहार भी कर सकता है ।

Read Birth Story of Krishna in English

श्री कृष्ण बाल लीला

भगवन श्री कृष्ण की बाल लीला का वर्णन किये बिना उनके जन्म की कथा अधूरी है ।  उन्हें प्यार से माखनचोर भी कहा जाता है, मक्खन उन्हें बहुत प्रिय था और उसे चुराकर खाने से जैसे उसका स्वाद दुगना हो जाता था । वृंदावन की सभी औरतें मक्खन को कृष्ण और उनके सखाओं के डर से छुपा कर रखती थी । परंतु वो भी कम कहाँ थे , चाहे जितनी भी दूर हो मक्खन की हांड़ी  वो उसे ढूंढ ही लेते थे । सारा वृन्दावन कृष्ण की माया में डूबा हुआ था । हर कोई प्रेम और सुख से जीवन व्यतीत कर रहा था ।

भगवान श्री कृष्ण ने बालक रूप में कई लीलाएं रची और बढे बढे दैत्यों और दानवों का वध किया । भगवान कृष्ण ने सोलह वर्ष की उम्र में कंस का भी वध किया और उनके पिता और अपने नाना, उग्रसेन को मथुरा का राजा घोषित किया ।

श्री कृष्ण का कालिया दमन

इसी तरह खेलते और गाय चराते चराते, कृष्ण की बांसुरी की तान सुनते हुए ही दिन गुजरने लगे । इसी बीच खेल ही खेल में एक दिन कृष्ण की गेंद यमुना में गिर गयी । यमुना का पानी उसमे स्तिथ नाग के विष से काला हो चूका था । गेंद की तलाश में कृष्ण ने यमुना में छलांग लगा दी, यह देख उनके सभी सखा भयभीत हो उठे । कालिया नामक उस नाग ने अपने एक सौ दस फनो से कृष्ण पर वार किया । कृष्ण ने विराट रूप धारण कर उसके फन के ऊपर मानो सारी पृथ्वी का भार रख दिया ।

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जब कृष्ण उसे मारने ही वाले थे तो नाग की पत्नियों ने कृष्ण से उन्हें छोड़ने की विनती की । कृष्ण के स्वरुप  को जान कालिया नाग ने भी उनसे क्षमायाचना मांगी और यह विश्वास दिलाया की वह फिर कभी किसीको भी कोई शती नहीं पहुंचाएंगे  तब कृष्ण ने उसे क्षमा कर दिया ।

श्री कृष्ण के स्वरुप की अनुभूति – गोबवर्धन पर्वत

एक घटना ऐसी भी घटी थी जिसके पश्चात सभी गाँव वालों को कृष्ण के भगवान् रूप का विश्वास हो चूका था । वह ये जान चुके थे की ये कोई साधारण बालक नहीं हैं, यह स्वयं भगवान् हैं जो इंसान के रूप में अवतरित हुए हैं ।  जब गाँव वालों ने इंद्रोत्सव न मनाकर गोपोत्सव मनाने लगे, तब इंद्रदेव बहुत क्रोधित हो उठे और उन्होंने पुरे गाँव को नष्ट करने के लिए अत्यधिक वृष्टि करवा दी । चरों ओर पानी ही पानी था , जन जीवन अस्त व्यस्त हो चूका था । गांववासी त्राहि त्राहि कर रहे थे, तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को एक ऊँगली में उठा लिया और सभी गाँववासियों को उसके निचे शरण दी । यह देख इंद्रदेव को भी अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने श्री कृष्ण से क्षमा मांगी । गांववासियों ने कृष्ण को भगवान् रूप में अनुभव किया ।

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भगवान् श्री कृष्ण की हर लीला रोमांचक है और इस बात का विश्वास दिलाती है की जब जब दुस्टों ने अपने अत्याचारों से पृथ्वी पर सुख और शांति का विनाश किया है, तब तब ईश्वर पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं और उन्होंने दुस्टों का संहार किया है । भगवान् श्री कृष्ण की लीला का व्याख्यान अंतरात्मा में एक परम आनंद की अनुभूति कराता है ।

श्री कृष्ण की वाणी को भगवद गीता में पिरोया गया ताकि युगों युगों तक ये हमें हमारे कठिन समय में मार्ग दर्शन करे ।

उनकी रची भगवद गीता, हमेशा से ही मनुष्य का मार्ग दर्शन करती आयीं हैं । गीता में व्यक्त हर बात अनमोल है, अगर मनुष्य इसका पालन करने लगे तो उसका जीवन सार्थक है । आज भी अगर हम खुद को किसी सवाल से घिरा पाएं या हमें ये न समझ आये की क्या सही है और क्या गलत, तो हम भगवद गीता में  अपने सवालों के जवाब ढूंढ सकते हैं ।

” फल की अभिलाषा छोड़ कर कर्म करने वाला पुरुष ही अपने जीवन को सफल बनाता है । “

– भगवद गीता

if interested, know Why should we read Bhagvad Gita?

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