Vat Savitri Katha in Hindi

This is the Vat Savitri Katha (वट सावित्री कथा) which is read and heard by fasting married women who observe the Vat Savitri Vrat (वट सावित्री व्रत). Vat Savitri Vrat (vrat means fast) is observed on the Jyeshtha Purnima which falls on the full moon day of the Jyeshtha month of Hindu calender (May-June). Vat Purnima (Purnima means full moon day) is one of the very important day of religious faith when the Hindu married women in North India and West India worship Savitri as an ideal wife who had been able to snatch away life of her husband from the clutches of death with her patience, dedication, loyalty and intelligence. In India, Savitri is the epitome of an ideal wife. Along with the Karva Chauth Vrat, the Vat Savitri Vrat is an important day in the life of a Hindu married woman when she fasts, worships and make offerings to the Vat tree (banyan tree) under which it is said that the dead body of Satyavan, the husband of Savitri lied and from where she managed to pursue Yamaraj (the Hindu God of Death) to give back the life of her husband Satyavan.

वट पूर्णिमा कथा – Vat Purnima Story in Hindi

एक समय की बात है, मद्र देश के परम ज्ञानी राजा अश्वपति ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर सावित्री Vat Savitri Katha Hindiदेवी की पूजा की जिसके फलस्वरूप उन्हे सर्वगुण सम्पन्न पुत्री प्राप्त हुई जिसका नाम सावित्री रखा गया। विवाह योग्य होने पर राजा ने अपनी पुत्री से स्वयं अपना वर चुनने के लिये कहा। इस तरह सावित्री अपना वर चुनने के लिये राजमहल से निकल पड़ी।

जिस दिन सावित्री वर का चयन कर के महल मे लौटी, उस दिन नारद मुनि राजा अश्वपति से भेंट के लिये पधारे। सावित्री ने नारद जी को प्रणाम किया तथा वर के संबंध मे पूछ्ने पर यह कह्ते हुये अपना निर्णय सुनाया- “राजा द्युमत्सेन जो अपना राज्य और दॄष्टि खो चुके हैं एवं जो अपनी दॄष्टिहीन पत्नी के साथ वन मे वास कर रहे हैं, उन्ही के आज्ञाकारी पुत्र सत्यवान को मैने अपने वर के रूप मे चुना है।

नारद मुनि ने सावित्री की बात सुनकर सत्यवान एवं सावित्री के गुणदोष और ग्रहों की गणना करने के उपरान्त राजा अश्वपति से कहा- राजन, तुम्हारी कन्या ने निःसन्देह बहुत ही अच्छे वर का चुनाव किया है जो अत्यन्त गुणी एवं धर्मात्मा है परन्तु दुर्भाग्यवश वह एक वर्ष के भीतर ही मृत्यु को प्राप्त होगा। यदि तुमने सावित्री का विवाह सत्यवान से किया तो वह अगले साल जब वह बारह वर्ष की होगी तभी विधवा हो जाएगी।”

नारद मुनि के वचन सुनकर भयभीत राजा ने सावित्री से अन्य वर चुनने के लिये कहा। यह सुनकर सावित्री ने अपने पिता से कहा- “पिताजी! जिस तरह राजा एक ही बार आज्ञा देते हैं, पण्डित एक ही बार प्रतिज्ञा करते हैं तथा कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है, उसी तरह आर्य कन्याएं भी एक ही बार अपना वर चुनती हैं। मैने सत्यवान को मन से अपना पति स्वीकार कर लिया है एवं अब किसी और को अपने हॄदय मे स्थान नही दे सकती। अब सत्यवान चाहे अल्पायु हो अथवा दीर्घायु, मैं अन्य किसी के साथ विवाह नही कर सकती।”

सावित्री के दृढनिशचय को देखकर राजा अश्वपति ने उसका विवाह सत्यवान के साथ कर दिया। नारद मुनि से अपने पति के म्रुत्यु का दिन जानने के पश्चात सावित्री अपने सास, ससुर एवं सत्यवान के साथ वन मे रहने के लिये चली गयी। वन मे सत्यवान लकड़ियाँ काट कर अपने परिवार का पालन पोषण करने लगा।

समय बीतता गया एवम सावित्री बारह वर्ष की हो गयी। नारद मुनि के वचन अनुसार जब सत्यवान के जीवन के तीन दिन शेष रह गये तब सावित्री ने उपवास प्रारम्भ कर दिया। सत्यवान के कथित म्रुत्युदिवस के दिन सावित्री ने पितरों की पूजा की एवं अपने सास ससुर कि आज्ञा ले कर सत्यवान, जो लकड़ियाँ काटने जा रहा था, के साथ वन मे चल दी।

वन मे सत्यवान ने सावित्री को मीठे फल दिये एवं स्वयं एक वॄक्ष पर चढ कर लकड़ियाँ काटने लगा परन्तु उसके सिर मे अत्यन्त पीड़ा के कारण वह पेड़ से नीचे उतर आया। यह देखकर सावित्री का हॄदय काँपने लगा एवं उसे नारद मुनि के वचन याद आने लगे परन्तु सावित्री ने धैर्य न खोते हुये सत्यवान को पास के वट वॄक्ष के नीचे लिटा दिया एवं उसका सिर अपनी गोद मे रख लिया। उसी क्षण उसने यमराज को दक्षिण दिशा से आते हुए देखा।

जब यमराज सत्यवान के जीव को लेकर चलने लगे तब सावित्री भी उन के पीछे पीछे चलने लगी। यह देखकर यमराज ने उसे समझा कर लौट जाने को कहा। यह सुनकर सावित्री ने यमराज से कहा- “हे यमराज! पत्नी का धर्म है कि वह छाया की तरह अपने पति के साथ रहे। मुझे अपने पति के साथ जाने से रोक कर कृपया मेरी मर्यादा को भंग ना होने दें। मुझ पतिव्रता को अपने धर्म का पालन करने दीजीये।” यह सुनकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए तथा सावित्री को अपने पति के प्राण छोड़्कर कोइ भी अन्य वर माँगने को कहा। तब सावित्री ने अपने सास ससुर के नेत्रों की ज्योति एवं उनके दीर्घायु होने का वर मांगा। यमराज तथास्तु कहकर आगे चलने लगे।

सावित्री अब भी यमराज के पीछे चल रही थी। यह देखकर यमराज ने उसे फिर लौट जाने को कहा। इसपर सावित्री बोली- “हे धर्मराज! मै अपने पति के पीछे चलूँ, यही मेरा कर्तव्य है। पति के बिना मेरे जीवन की कोइ सार्थकता नही है, मै अपने पति से भिन्न मार्ग पर नही चल सकती।” पतिव्रता पत्नि की निष्ठा को देखकर अति प्रसन्न होते हुये यमराज ने सावित्री को पुनः एक वर माँगने के लिये कह। इस बार सावित्री ने अपने ससुर का खोया हुआ राज्य एवं अपने लिये सौ भाइयों का वर माँगा। यमराज ने इस पर भी तथास्तु कह एवं आगे चल दिये परन्तु सावित्री अब भी उनके पीछे चल रही थी।

यमराज के कई तरह के आग्रह करने पर भी सवित्री नही लौटी तब यमराज ने कहा- “हे देवी! अब भी यदि तुम्हारे मन मे कोई कामना रह गई हो तो तुम मुझ से उसके लिये भी वर माँग लो।” तब सावित्री बोली- “हे देव! यदि आप मेरी कामना पूर्ण करना ही चाहते हैं तो मुझे सौ पुत्रौं की माता होने का वर दीजीए।” यमराज ने सावित्री की यह मनोकामना भी पूर्ण की एवं तथास्तु कहकर आगे बढ़े।

इतना होने पर भी जब सावित्री ने यमराज के पीछे आना नही छोड़ा तब यमराज ने उससे कहा- “हे देवी! तुम ने मुझ से जो भी माँगा मैने तुम्हे वह दिया। अब तो तुम मेरे पीछे आना बन्द करो।” यह सुनकर सावित्री बोली- “हे यमराज! आपने मुझे सौ पुत्रों की माता होने का वर दिया है परन्तु अपने पति के जीवित ना होने की दशा मे आपका यह वरदान कैसे पूरा होगा? मै पति के बिना सौ पुत्रों को कैसे जन्म दे सकती हूँ?” यह सुन्कर एवं सावित्री की धर्मनिष्ठा को देखकर यमराज ने सत्यवान के जीव को मुक्त कर दिया।

यमराज के अन्तर्ध्यान होने के पश्चात सावित्री उसी वट वृक्ष के नीचे आई जहाँ सत्यवान का मृत शरीर रखा था। सावित्री ने बड़ के पेड़ को प्रणाम करके जैसे ही उसकी परिक्रमा पूरी की वैसे ही सत्यवान के मृत देह मे प्राण लौट आए। दोनो पति पत्नी जब खुशी खुशी घर वापस लौटे तब उन्होने देखा कि द्युमत्सेन अपना खोया हुआ राज्य वापस पा चुके थे एवं उनकी और उनके पत्नी की आखें ठीक हो गई थीं। सावित्री के पिता अश्वसेन को भी सौ पुत्रों की प्राप्ति हुई एवं सावित्री भी सौ पुत्रों की माता हुई।

सावित्री ने अपने दृढ्निश्चय, पतिव्रत धर्म एवं कर्तव्यनिष्ठा से अपने पतिकुल एवं पितृकुल दोनो का उद्धार किया। सत्यवान एवं सावित्री दोनो की कीर्ति चारों दिशाओं मे फैली।

The Vat Savitri Katha in Hindi is meant for women who want to get access to this story of Savitri and Satyavan for the Vat Purnima day pooja. For others, who do not follow Hindi and yet want to know this interesting story can get this Vat Savitri Katha in English by reading Savitri Satyavan Story

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